Thursday, September 26, 2019

☞   26/09/ 2019 भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर चर्चा की गई है, साथ ही इसमें भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली और उसकी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

विगत कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में चिकित्सकों एवं अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के विरुद्ध हिंसा के कई मामले सामने आए जिससे चिकित्सा पेशेवरों में आक्रोश फैला और चिकित्सकों ने हड़ताल कर अपना प्रतिरोध जताया। असम के एक अस्पताल में उन्मादी भीड़ द्वारा 73 वर्षीय चिकित्सक की पीट-पीटकर हत्या कर देने का मामला विशेष रूप से क्रूर और देश को झकझोर देने वाला रहा। भारत के विभिन्न हिस्सों में स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ मारपीट और अस्पताल के उपकरणों को क्षति पहुँचाने की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं।

स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा - एक गंभीर विषय

  • भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association-IMA) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि देश भर के लगभग 75 प्रतिशत डॉक्टरों ने कार्यस्थल पर हिंसा का सामना किया।
  • IMA द्वारा आयोजित एक अन्य सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि 75 प्रतिशत डॉक्टरों ने अपशब्दों की और 12 प्रतिशत ने शारीरिक हिंसा की शिकायत की है।
  • स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हो रही हिंसक वारदातों की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि वर्ष 2017 में दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित संस्थान AIIMS के डॉक्टर्स हिंसा से इतने भयभीत हो गए थे कि रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन द्वारा उन्हें आत्मरक्षा हेतु प्रशिक्षण देना पड़ा था।
  • आँकड़े दर्शाते हैं कि डॉक्टर्स को हिंसा का सबसे अधिक खतरा आपातकालीन सेवाएँ प्रदान करते समय ही रहता है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का सार डॉक्टरों, अस्पतालों और उपकरणों की कमी में निहित है।

समस्या से निपटने का प्रयास- चिकित्सा सुरक्षा अधिनियम

बीते दिनों प्रदर्शन का केंद्र रहे पश्चिम बंगाल सहित देश के कुल 19 राज्यों ने चिकित्सा सुरक्षा अधिनियम (Medical Protection Act-MPA) पारित किया हुआ है।
  • हालाँकि यह अधिनियम व्यावहारिक रूप से डॉक्टरों की रक्षा करने में विफल रहता है, क्योंकि इसे न तो भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) में और न ही दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure-CrPC) में शामिल किया गया है।

अधिनियम के प्रमुख बिंदु:

  • चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसात्मक कार्यवाही कानूनन दंडनीय अपराध है।
  • किसी भी चिकित्सा सेवा संस्थान या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना भी दंडनीय अपराध के रूप में माना जाएगा।
  • इसमें अस्पताल के उपकरणों को क्षति पहुँचाना, एंबुलेंस जलाना और मेडिकल स्टोरों को तोड़ना आदि शामिल हैं।
  • दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 3 वर्ष की अवधि के लिये कारावास और 50 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • इस संदर्भ में कोई भी अपराध संज्ञेय या गैर संज्ञेय है इस बात का निर्णय किये गए अपराध के आधार पर लिया जाएगा।
  • किसी भी चिकित्सा उपकरण को नुकसान पहुँचाना एक दंडनीय अपराध है और ऐसा करने पर अपराधी को क्षतिग्रस्त उपकरण की लागत का दोगुना भुगतान करने के लिये उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

अन्य कानूनी प्रावधान

  • वर्तमान में भारतीय दंड संहिता, 1860 किसी व्यक्ति या उसकी संपत्ति को हुए नुकसान के संबंध में दंड का प्रावधान करता है।
  • इसके अलावा संहिता में किसी व्यक्ति को गंभीर शारीरिक चोट पहुँचाने पर भी दंड का प्रावधान किया गया है।

अलग कानून की मांग

यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि हमारे पास हिंसा या नुकसान पहुँचाने के संबंध में पहले से ही प्रावधान हैं तो फिर हमें नए प्रावधानों की आवश्यकता क्यों है? इस प्रश्न के लिये चिकित्सकों द्वारा सदैव यह तर्क दिया जाता है कि जब एक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के साथ मारपीट की जाती है या उसे निःशक्त किया जाता है अथवा उसकी जान ले ली जाती है तो हिंसा का शिकार केवल स्वास्थ्यकर्मी ही नहीं होता बल्कि वे रोगी भी होते हैं जिनकी देखभाल उसके द्वारा की जा रही थी। साथ ही इसका असर अन्य लोगों पर भी पड़ता है क्योंकि हिंसा और तोड़फोड़ के कारण तथा इसके प्रतिरोध में पीड़ित कर्मियों द्वारा कार्य बंद करने अथवा चिकित्सकों के हड़ताल पर चले जाने से अस्पताल या स्वास्थ्य सेवा केंद्र का कामकाज बाधित हो जाता है। अतः इस तरह की हिंसा के शिकार कई निर्दोष व्यक्ति हो जाते हैं। यदि किसी रोगी की मौत या उसकी स्थिति बिगड़ने से यह हिंसा भड़कती है तो इस हिंसा के परिणामस्वरूप कई अन्य रोगियों की मृत्यु हो सकती है या उनकी स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ सकती है। इस प्रकार के गंभीर परिणामों से बचने के लिये ही एक अलग कानून की आवश्यकता महसूस की जाती है, ताकि इस तरह के मामलों को जल्द-से-जल्द निपटा दिया जाए और परिस्थितियाँ गंभीर रूप धारण न कर सकें।

अपर्याप्त स्वास्थ्य प्रणाली

  • आँकड़ों के अनुसार, भारत के 1.3 बिलियन लोगों के लिये हमारे पास सिर्फ 10 लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं। इस हिसाब से भारत में प्रत्येक 13000 नागरिकों पर केवल 1 डॉक्टर मौजूद है।
उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस अनुपात की सिफारिश की है, वह 1:1000 है यानी देश में प्रत्येक 1000 नागरिकों पर 1 डॉक्टर होना अनिवार्य है।
  • उचित अनुपात की प्राप्ति के लिये भारत को वर्तमान में मौजूदा डॉक्टरों की संख्या को दोगुना करना होगा।
  • भारतीय चिकित्सा परिषद ने माना है कि झोला छाप डॉक्टरों (वे डॉक्टर जो न तो पंजीकृत हैं और न ही उनके पास उचित डिग्री है) की संस्कृति हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के लिये काफी खतरनाक है। परिषद के आँकड़े बताते हैं कि देश भर में 50 प्रतिशत से अधिक डॉक्टर झोला छाप हैं। जहाँ एक ओर शहरी क्षेत्रों में योग्य चिकित्सकों की संख्या 58 प्रतिशत है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा 19 प्रतिशत से भी कम है।
  • भारत अपनी GDP का कुल 1.2 प्रतिशत हिस्सा ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करता है, जो कि कई अल्पविकसित देशों जैसे- पाकिस्तान, सूडान और कंबोडिया आदि से भी कम है
  • कई अन्य आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत में प्रत्येक 10,189 लोगों के लिये मात्र 1 सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है, वहीं देश में उपलब्ध 1 मिलियन डॉक्टरों में से मात्र 10 प्रतिशत ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करते हैं।

भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की समस्याएँ

  • संसाधनों की कमी
भारतीय डॉक्टर अत्यधिक मरीज़ों की भीड़, अपर्याप्त कर्मचारियों, दवाओं और बुनियादी ढाँचे की कमी जैसी चिंतनीय परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं। इन सभी के प्रभाव से उनकी कार्यकुशलता में कमी आती है और जीवन रक्षा के कार्य में वे अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान नहीं दे पाते।
  • निजी संस्थानों की महँगी शिक्षा
भारत में निजी संस्थानों की चिकित्सा शिक्षा की लागत काफी तेज़ी से बढ़ती जा रही है, वहीं सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों में इतनी क्षमता नहीं है कि वे देश की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। निजी संस्थानों की अत्यधिक चिकित्सा शिक्षा लागत और सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों में सीटों की कमी से देश में डॉक्टरों की कमी का संकट और गहराता जा रहा है।
  • डॉक्टरों पर कार्य का अधिक बोझ
देश में 13000 लोगों पर मात्र एक डॉक्टर उपलब्ध है, जबकि वैश्विक स्तर पर आदर्श अनुपात 1:1000 है। यह आँकड़ा स्पष्ट रूप से देश के डॉक्टरों पर कार्य के अत्यधिक बोझ को दर्शाता है।
कभी-कभी डॉक्टरों को 18-18 घंटों तक भी कार्य करना पड़ता है, जिसके कारण वे कई मनोवैज्ञानिक बीमारियों से भी ग्रसित हो जाते हैं।
  • कानूनों का अप्रभावी कार्यान्वयन
देश में एक ओर आधे से अधिक राज्यों में चिकित्सा सुरक्षा अधिनियम लागू है, परंतु इसके बावजूद समय-समय पर इस प्रकार की हिंसक घटनाएँ सामने आती रहती हैं। जानकारों के अनुसार, इसका मुख्य कारण यह है कि इन घटनाओं को रोकने के लिये जो नियम-कानून बनाए गए हैं उनका सही ढंग से कार्यान्वयन नहीं हो रहा है।
  • विश्वास की कमी
डॉक्टरों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के साथ ही डॉक्टरों और मरीज़ों के बीच विश्वास की कमी भी धीरे-धीरे चिंता का विषय बनती जा रही है।

आगे की राह

  • चिकित्सकों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के लिये यह आवश्यक है कि चिकित्सकों और मरीज़ के परिवार वालों के बीच संचार की उचित व्यवस्था की जाए और इलाज के प्रत्येक स्तर पर मरीज़ की स्थिति की सूचना जल्द-से-जल्द उसके परिवार वालों को दी जाए, चाहे मरीज़ की हालत में सुधार हुआ हो या नहीं।
  • प्रायः चिकित्सकों पर हमला किसी मरीज़ की मौत के बाद ही होता है। मरीज़ की मृत्यु गंभीर स्वास्थ्य विकार के कारण हुई या फिर चिकित्सकों की लापरवाही के कारण, इसका निर्धारण करने के लिये प्रत्येक अस्पताल में एक जाँच टीम का गठन किया जाना चाहिये।
  • यदि स्वास्थ्य संबंधी सरकारी योजनाओं में उपचार के मूल्य निर्धारण की व्यवस्था की जाए तो यह उन लोगों के लिये काफी लाभदायक साबित हो सकता है जो वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा का भार वहन नहीं कर सकते।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे और सरकारी अस्पतालों की क्षमताओं को बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

भारत में नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करना नीति निर्माताओं के लिये सदैव ही प्राथमिक विषय रहा है, इसके बावजूद भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में संसाधनों की कमी, डॉक्टरों पर कार्य का अधिक बोझ और कानूनों का अप्रभावी कार्यान्वयन जैसी कई समस्याएँ विद्यमान हैं। यदि हम भारत को एक स्वस्थ राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो उपर्युक्त समस्याओं को दूर किया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिये चिकित्सक एवं मरीज़ों के बीच संवेदनात्मक संबंध भी स्थापित करने होंगे, ताकि चिकित्सकों के साथ होने वाली हिंसक घटनाओं को रोका जा सके।

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