Wednesday, July 1, 1970
☞ होलिका दहन
July 01, 1970
भारत मे त्योहार एवं मेलें
होलिका दहन का त्योहार होली के एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह त्योहार हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। होलिका दहन के इस त्योहार को भारत के साथ ही नेपाल के भी कई हिस्सों में मनाया जाता है। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई के जीत के रुप में भी देखा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व फाल्गुन माह की पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाता हैं।
इस दिन लोग लकड़ियो तथा उपलो की होलिका बनाकर उसे जलाते हैं और ईश्वर से अपनी इच्छापूर्ति को लेकर प्रर्थना करते हैं। यह दिन हमें इस बात का विश्वास दिलाता है कि यदि हम सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करेंगे तो वह हमारी प्रार्थनाओं को अवश्य सुनेंगे और भक्त प्रहलाद की तरह अपने सभी भक्तों हर तरह के संकटों से रक्षा करेंगे।
वर्ष 2019 में होलिका दहन का पर्व 20 मार्च, बुधवार के दिन मनाया जायेगा।
होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई के जीत के रुप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन होलिका नामक राक्षसी की मृत्यु हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग काल में हिरणकश्यप नामक एक बहुत ही अभिमानी राजा हुआ करता था और अपनी शक्तियों के मय में चूर होकर वह स्वंय को भगवान समझने लगा था। वह चाहता था, हर कोई भगवान की जगह उसकी पूजा करे लेकिन स्वंय उसके पुत्र प्रहलाद ने उसकी पूजा करना से इंकार कर दिया और भगवान को ही असली ईश्वर बताया।
इस बात से नाराज होकर हिरणकश्यप ने प्रहलाद को कई सारी सजा दी, लेकिन भगवान विष्णु ने हर बार प्रहलाद रक्षा की और इस तरह से अपने सारी योजनाएं विफल होते देख, हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर प्रहलाद को अग्नि में जलाकर मारने की योजना बनाई। जिसमें होलिका प्रहलाद को लेकर चिता पर बैठी परन्तु क्योंकि होलिका को अग्नि में ना जलने का वरदान प्राप्त था, क्योंकि वरदान स्वरुप उसे ऐसी चादर मिली हुई थी जो आग में नही जलती थी।
इसलिए हिरणकश्यप को लगा की होलिका अग्नि में सुरक्षित बच जायेगी और प्रहलाद जल जायेगा। लेकिन जैसी ही होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि समाधि में बैठी वह चादर वायु के वेग से उड़कर प्रहलाद पर जा पड़ी और होलिका शरीर पर चादर ना होने के वजह से वह वहीं जलकर भस्म हो गई।
इसके पश्चात भगवान विष्णु नरसिंह अवतार के रुप में प्रकट हुए क्योंकि हिरणकश्यप को ब्रम्हा जी से वरदान मिला हुआ था कि “ना वह दिन मरेगा, ना रात में मरेगा, ना जमीन पर मरेगा, नाही आकाश में मरेगा,......... नाही देव के हाथों मरेगा, ना मनुष्य के और नाही किसी जानवर या दानव के हाथों।”
जब भगवान विष्णु नरसिंह के अवतार में प्रकट हुए तो उन्होंने कहा कि मैं हर जगह रहता हुं, मैं तुझ जैसे राक्षस के महल में भी रहता और मैं स्वंय तेरे अंदर भी हुं, मैं अपवित्र को पवित्र करता हुं, लेकिन अपवित्र मुझे अपवित्र नही कर सकता और ले देख अपने काल को “नाही यह दिन है, नाही रात है, नाही मैं नर हु और नही पशु.......... नाही तेरी मृत्यु जमीन पर होगी नाही आकाश में।” इतना कहकर भगवान नरसिंह ने हिरणकश्यप का सीना चीर कर उसे मार डाला। तभी से इस दिन बुराई पर अच्छाई के जीत के रुप में होलिका दहन का पर्व मनाया जाने लगा।
होलिका दहन के त्योहार की तैयारी कई दिन पहले से ही शुरु कर दी जाती है। इसमें गांव, कस्बों तथा मुहल्लों के लोगो द्वारा होलिका के लिए लकड़ी इकठ्ठा करना शुरु कर दिया जाता है। इस इकठ्ठा किये गये लकड़ी द्वारा होलिका बनायी जाती है, होलिका को बनाने में गोबर के उपलों का भी प्रयोग किया जाता है। इसके पश्चात इस होलिका को होलिका दहन के दिन शुभ मूहर्त पर जलाया जाता है, होलिका की इस अग्नि को देखने के लिए पूरे क्षेत्र के लोग इकठ्ठा होते हैं और अपनी व्यर्थ तथा अपवित्र चीजें इसमें फेंक देते हैं।
जो इस बात को दिखाता है की अग्नि हर बुरी चीज का नाश कर देती हैं और हमें प्रकाश प्रदान करने के साथ हमारी रक्षा भी करती है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में होलिका दहन के दिन उबटन से मालिश करने के पश्चात निकलने वाले कचरे को होलिका की अग्नि में फेंकने का रिवाज है। ऐसी मान्यता है ऐसा करने से शरीर की अपवित्रता और दुर्भाव अग्नि में नष्ट हो जाते हैं। बहुत सारे लोग बुरे साये से बचने के लिए होलिका की अग्नि की राख को अपने माथे पर भी लगाते हैं।
होलिका दहन के वर्तमान रुप में पहले की अपेक्षा काफी परिवर्तन हो गया है। पहले लोग इस दिन को बुराई पर अच्छाई के विजय के प्रतीक में मनाते थे। पहले के समय में होलिका साधरण तरीके से बनाई जाती थी और इनका आकार मध्यम या छोटा हुआ करता था। इसके साथ ही पहले के समय में होलिका बनाने में मुख्यतः सुखी लकड़ी, गोबर के उपले तथा खर-पतवार का उपयोग किया जाता था और सामान्यतः इसे रिहायशी इलाके से कुछ दूरी पर खाली स्थान या फिर बागीचों में बनाया जाता था, परन्तु आजकल के समय में सबकुछ इसके विपरीत हो गया है।
आज के समय में लोग रिहायशी इलाकों में या फिर खेतों के पास काफी बड़ी-बड़ी होलिकाएं बनाते हैं। जिससे काफी उंची लपटे उठती हैं और इससे आग लगने का भी भय रहता है। पहले के समय में लोग होलिका बनाने में लकड़ी तथा खरपतवार जैसी प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करते थे, लेकिन आज के समय में लोग होलिका में प्लास्टिक, टायर-ट्यूब, रबर आदि जैसी चीजों का प्रयोग करते हैं।
इसने दहन से उत्पन्न होने वाली विषैली गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ ही पर्यावरण के लिए भी काफी खतरनाक होती हैं। इसलिए हमें होलिका दहन के पर्व को साधरण और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाने का प्रयत्न करना चाहिए। जिससे हमारा होलिका दहन का यह पर्व अपने सत्य के विजय के संदेश को लोगो के मध्य और भी अच्छे से प्रदर्शित कर पाये।
फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाये जाने वाले होलिका दहन के इस पर्व का इतिहास काफी पुराना है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में 300 ई.पू. समय से होलिका दहन संबंधित साक्ष्य मिले है। होलिका दहन के इस त्योहार से जुड़ी कई सारी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं और इनमें से जो सबसे अधिक प्रचलित है। वह है, प्रहलाद और होलिका की कथा जिसके अनुसार, सतयुग काल में हिरणकश्यप नामक एक बहुत ही क्रूर शासक हुआ करता था और अपने शक्ति के घमंड में चूर होकर वह स्वंय को ईश्वर समझने लगा और चाहता था, कि उसके राज्य का हरेक व्यक्ति ईश्वर के रुप में उसकी पूजा करे।
लेकिन इस बात से स्वंय उसके पुत्र प्रहलाद ने इंकार कर दिया। जिससे क्रुद्ध होकर हिरणकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को मारने के कई प्रयास किये और अंत में अपने बहन होलिका के साथ मिलकर प्रहलाद को अग्नि में जलाकर मारने की योजना बनाई क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नही जल सकती।
इसलिए वह प्रहलाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गयी परन्तु ईश्वर ने प्रहलाद की रक्षा की और होलिका को उसके कर्मों का दंड देते हुए अग्नि में जलाकर भस्म कर दिया। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने स्वंय नरसिंह अवतार में अवतरित होकर हिरणकश्यप का वद्ध कर दिया। तभी से बुराई पर अच्छाई की इस जीत को देखते हुए होलिका दहन मनाने की प्रथा शुरु हुई।
इसके साथ ही इससे जुड़ी दूसरी जो सबसे महत्वपूर्ण कथा है। उसके अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी लेकिन घोर तपस्या में लीन भगवान शिव ने उनके तरफ ध्यान ही नही दिया। तब भगवान शिव का ध्यान भंग करने के लिए स्वंय प्रेम के देवता कामदेव सामने आये और उन्होंने भगवान शिव पर पुष्प बाड़ चला दिया। अपनी तपस्या भंग होने से शिवजी काफी क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया।
अगले दिन क्रोध शांत होने पर कामदेव की पत्नी रति की विनती पर भगवान शिव ने कामदेव को फिर से जीवित कर दिया। पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव के भस्म होने कारण से होलिका दहन के त्योहार की उत्पत्ति हुई और अगले दिन उनके जीवित होने के खुशी में होली का पर्व मनाया जाने लगा।
होलिका दहन का यह पर्व हमारे जीवन में एक विशेष महत्व रखता है, यह हमें सत्य की शक्ति का अहसास दिलाता है। इस पर्व से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को कभी भी अपनी शक्ति तथा वैभव घमंड नही करना चाहिए और नाही कुमार्ग पर चलते अत्याचार करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने वालों का पतन निश्चित होता है।
इसके साथ ही होलिका दहन पर्व के पौराणिक किस्से हमें हमारे जीवन में अग्नि और प्रकाश के महत्व को समझाता है और हमें इस बात का ज्ञान कराते हैं कि ईश्वर सच्चाई के मार्ग पर चलने वालों की रक्षा अवश्य करते हैं।
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