Thursday, July 2, 1970
☞ ईद-उल-फितर (EID AL-FITR FESTIVAL)
July 02, 1970
भारत मे त्योहार एवं मेलें
ईद-उल-फितर रमजान के पवित्र महिने के बाद मनाया जाने वाला एक त्योहार है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार ईद-उल-फितर का त्योहार शवाल अल मुकर्रम्म को मनाया जाता है, जोकि इस्लामी कैलेंडर के दसवें महीने का पहला दिन होता है। यह पर्व रमजान के चांद डूबने और नए चांद के दिखने पर शुरु होता है। इस पर्व पर लोगों द्वारा अपने घरों पर दावतों का आयोजन किया जाता है और इस दावत में अपने रिश्तेदारों और मित्रों को आमंत्रित किया जाता है।
भारत में भी इस पर्व को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है और देश भर इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है ताकि लोग अपने परिवार के साथ ईद के इस विशेष पर्व का आनंद ले सके।
वर्ष 2019 में ईद-उल-फितर का त्योहार 4 जून, मंगलवार को शुरु होकर 5 जून, बुधवार के दिन समाप्त होगा।
ईद-उल-फितर या फिर जिसे सिर्फ ईद के नाम से भी जाना जाता है, मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ईद-उल-फितर का यह पर्व रमजान के 30 रोजों के बाद चांद देखकर मनाया जाता है। वैसे तो इस पर्व को मनाये जाने के लेकर कई सारे मत प्रचलित है लेकिन जो इस्लामिक मान्यता सबसे अधिक प्रचलित है उसके अनुसार इसी दिन पैगम्बर मोहम्मद साहब ने बद्र के युद्ध में विजय प्राप्त की थी। तभी से इस पर्व का आरंभ हुआ और दुनियां भर के मुसलमान इस दिन के जश्न को बड़ी ही धूम-धाम के साथ मनाने लगे।
वास्तव में ईद-उल-फितर का यह त्योहार भाईचारे और प्रेम को बढ़ावा देने वाला त्योहार है क्योंकि इस दिन को मुस्लिम समुदाय के लोग दूसरे धर्म के लोगों के साथ भी मिलकर मनाते है और उन्हें अपने घरों पर दावत में आमंत्रित करते तथा अल्लाह से अपने परिवार और दोस्तों के सलामती और बरक्कत की दुआ करते है। यहीं कारण है कि ईद-उल-फितर के इस त्योहार को इतने धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
हर पर्व के तरह ईद-उल-फितर के पर्व को मनाने का भी अपना एक विशेष तरीका और रीती रिवाज है। रमाजान महीने के समाप्त होने के बाद मनाया जाने वाले इस पर्व पर महौल काफी खुशनुमा होता है। इस दिन लोग सुबह में स्नान करके नये कपड़े पहनते है और मस्जिदों में नमाज पढ़ने के लिए जाते है।
इस दिन सफेद कपड़े पहनना और इत्र लगाना काफी शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सफेद रंग सादगी और पवित्रता की निशानी है। इसके साथ ही ईद के दिन नमाज पढ़ने से पहले खजूर खाने का भी एक विशेष रिवाज है। ऐसा माना जाता है नमाज पढ़ने से पहले खजूर खाने से मन शुद्ध हो जाता है।
ईद-उल-फितर के दिन मस्जिदों में नमाज पढ़ने वालों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस दिन की नमाज के लिए मस्जिदों में विशेष व्यवस्थाएं की जाती है ताकि नमाज पढ़ने वालों को किसी तरह की असुविधा का सामना ना करना पड़े। नमाज अदा करने के बाद सभी एक-दूसरे से गले मिलते है और एक-दूसरे को ईद की बधाई देते है। इसके साथ ही ईद-उल-फितर के मौके पर सेवाइयां बनाने और खिलाने का भी एक विशेष रिवाज है।
इस दिन लगभग हर मुस्लिम घर में सेवई अवश्य बनाई जाती है और उनके द्वारा अपने मित्रों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दावत पर भी आमंत्रित किया जाता है। ऐसा माना जाता है ईद-उल-फितर के मौके पर सेवई खिलाने से संबंध प्रगाढ़ होते है और रिश्तों की कढ़वाहट दूर हो जाती है।
इसके साथ ही इस विशेष त्योहार पर ईदी देने का भी एक रिवाज है। जिसमें हर बड़ा व्यक्ति अपने से छोटे को अपने सामर्थ्य अनुसार कुछ रुपये या उपहार प्रदान करता है, इसी रकम या तोहफे को ईदी कहा जाता है।
हर पर्व के तरह ईद-उल-फितर के त्योहार में भी कई प्रकार के परिवर्तन हुए है। इनमें से कई परिवर्तन काफी अच्छे है। वहीं इस पर्व में समय के साथ कुछ ऐसे भी परिवर्तन हुए है, जिनमें हमें बदलाव की आवश्यकता है। वैसे तो आज के समय में ईद-उल-फितर का यह त्योहार पहले के अपेक्षा और भी ज्यादे लोकप्रिय हो गया है।
ईद के इस पर्व की सबसे ज्यादे खास बात यह है कि आज के समय में यह सिर्फ मुस्लिम धर्म का त्योहार नही रह गया है बल्कि दूसरे धर्म के लोग भी इस पर्व काफी उत्साह के साथ शरीक होते हैं। वास्तव में इस पर्व ने विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के बीच भाईचारे और एकता को बढ़ाने का भी कार्य किया है।
इस दिन को मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अपने घरों पर दावत में ना अपने रिश्तेदारों और संगे संबधियों को बुलाया जाता है बल्कि की दूसरे धर्म के दोस्तों तथा परिचित लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। भारत जैसे देश में ईद-उल-फितर का यह त्योहार हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ाने का भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करता है।
यही कारण है कि इस दिन को भारत में स्कूल, कालेज आफिस तथा अन्य सभी प्रकार के संस्थान बंद रहते है ताकि लोग इस विशेष पर्व का अच्छे से आनंद ले सके।
ईद-उल-फितर का त्योहार धार्मिक तथा समाजिक दोनो ही रुप से काफी महत्वपूर्ण है। रमजान के पवित्र महीने के बाद मनाये जाने वाले इस जश्न के त्योहार को पूरे विश्व भर के मुस्लिमों द्वारा काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
इस दिन को लेकर ऐसी मान्यता है कि सन् 624 में जंग ए बदर के बाद पैगम्बर मोहम्मद साहब ने पहली बार ईद-उल-फितर का यह त्योहार मनाया था। तभी से इस पर्व को मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा हर साल काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाने लगा।
यह पर्व सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देने में भी अपना एक अहम योगदान देता है। इस पर्व का यह धर्मनिरपेक्ष रुप ही सभी धर्मों के लोगों को इस त्योहार के ओर आकर्षित करता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अपने घरों पर दावत का आयोजन किया जाता है।
इस दावत का मुख्य हिस्सा होता है ईद पर बनने वाली विशेष सेवई, जिसे लोगों द्वारा काफी चाव से खाया जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा दूसरे धर्म के लोगों को भी अपने घरों पर दावत के लिए आमंत्रित किया जाता है। ईद के पर्व का यही प्रेम व्यवहार इस पर्व की खासियत है, जोकि समाज में प्रेम तथा भाई-चारे को बढ़ाने का कार्य करता है।
ईद-उल-फितर के पर्व का इतिहास काफी पुराना है ऐसा माना जाता है। ईस्लामिक कैलेंडेर के शव्वाल महीने के पहले दिन मनाये जाने वाले इस त्योहार के उत्पत्ति को लेकर कई सारे मत तथा कथाएं प्रचलित है लेकिन इस विषय में जो कथा सबसे ज्यादे प्रचलित है उसके अनुसार पहली बार ईद-उल-फितर का त्योहार पैगम्बर मुहम्मद साबह द्वारा जंग ए बदर के बाद मनाया गया था।
ऐसा माना जाता है कि इस जंग में पैगम्बर मुहम्मद साबह के नेतृत्व में मुसलमानों ने अपने से कई गुना बड़ी मजबूत मक्का की सेना को हराया था और इसी विजय के खुशी में अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के लिए मुहम्मद साहब ने अल्लाह की विशेष इबादत की थी और ईद-उल-फितर का यह त्योहार मनाया था।
इस घटना के बाद से मुसलमानों द्वारा हर वर्ष रमजान के पवित्र महीनें के बाद से पहला चांद दिखने पर ईद-उल-फितर का यह त्योहार मनाया जाने लगा। इस दिन लोग अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने महीने भर उन्हें अपना उपवास रखने के लिए इतनी शक्ति प्रदान की। ईद के दिन घरों में बढ़िया भोजन तथा सेवाइयां बनाने का रिवाज रहा है।
इस दिन लोग अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपने घरों पर दावत के लिए भी आमंत्रित करते है। इसके साथ ही इस दिन को कढ़वाहट दूर करने वाला और प्रेम तथा भाईचारे को बढ़ाने वाला त्योहार भी माना जाता है। इसी कारण से इस दिन लोगों द्वारा आपसी तथा घरेलू झगड़ो और विवादों का भी निपटारा किया जाता है।
इस दिन तोहफों के आदान-प्रदान का भी रिवाज है। इसके साथ ही ऐसा माना जाता है कि इस दिन मस्जिद में जाकर नमाज जरुर पढ़नी चाहिए और इसके पश्चात अपने सामर्थ्य अनुसार गरीबों को दान भी अवश्य देना चाहिए, इस कार्य को इस्लामी भाषा में जकात के नाम से जाना जाता है।
ईद-उल-फितर के दिन जो भी व्यक्ति ऐसा करता है, उसे अल्लाह की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि इस दिन मस्जिदों नमाज पढ़ने वालों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। अपने इन्हीं सांस्कृतिक और ऐताहासिक कारणों के वजह से ईद-उल-फितर का त्योहार ना सिर्फ मुस्लिमों बल्कि की सभी धर्म के लोगों में काफी प्रसिद्ध है।
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