Wednesday, July 1, 1970
☞ विषु पर्व (VISHU FESTIVAL)
July 01, 1970
भारत मे त्योहार एवं मेलें
विषु भारत के केरल राज्य में मनाया जाने वाला एक पर्व है। यह केरल के प्राचीनतम पर्वों में से एक है। मलयालम महीने मेष की पहली तिथि को मनाये जाने वाले इस त्योहार को केरलवासियों द्वारा नववर्ष के रुप में मनाया जाता है क्योंकि मलयालम पंचाग के अनुसार इस दिन सूर्य अपनी राशि को बदलकर ‘मेडम’ राशि में प्रवेश करता है, जिसके कारण नव वर्ष की शुरुआत होती है।
इस पर्व के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, इस त्योहार के उपलक्ष्य में केरल प्रदेश में सार्वजनिक अवकाश रहता है। इस दिन को लेकर कई प्रकार की मान्यताएं तथा कथाएं प्रचलित है लेकिन मुख्यतः यह पर्व भगवान विष्णु और उनके अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है।
वर्ष 2019 में विषु पर्व 15 अप्रैल, सोमवार के दिन काफी धूम-धाम के साथ मनाया गया।
विषु का यह मनमोहक त्योहार केरल राज्य में मनाया जाता है। इस दिन पूरी केरल राज्य अवकाश होता है और सभी दफ्तर, स्कूल, कालेज आदि बंद रहते है ताकि सभी लोग अपने परिवार के साथ मिलकर इस पर्व का आनंद ले सके।
विषु नामक इस पर्व को पूरे केरल तथा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को मनाये जाने को लेकर कई सारे कारण है। इस पर्व को मलयालम नव वर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। इसके साथ ही इसी दिन केरल में धान के फसल की बुवाई भी शुरु होती है। इसलिए यह किसानों के लिए भी एक खुशी का अवसर होता है, जिसमें वह अपने पिछलों फसल के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं और अपनी अगली फसल के अच्छे पैदावार की कामना करते है।
इसके साथ ही इस पर्व को मनाने के पीछे खगोलीय तथा धार्मिक कारण भी हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन सूर्य सीधा पूर्व दिशा से भगवान विष्णु के ऊपर पड़ता। यहीं कारण है कि इस दिन भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का भी वध किया था।
विषु का यह त्योहार केरल में रहने वाले हिंदु धर्म के लोगों का प्रमुख त्योहार है। इस पर्व का लोग काफी बेसब्री से प्रतीक्षा करते है क्योंकि इस दिन को केरल राज्य के नववर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। यहीं कारण है कि इस दिन राज्य भर में एक दिन का सार्वजनिक अवकाश भी होता है ताकि लोग इस पर्व को अपने परिवार के साथ मिलजुल कर धूम-धाम के साथ मना सके।
इस दिन लोग सुबह में नहा-धोकर विषुकानी दर्शन के साथ अपना दिन शुरु करते हैं। मलयालम में विषु का अर्थ होता है विष्णु और कानी का अर्थ देखना अर्थात विषुकानी का अर्थ है सर्वप्रथम भगवान विष्णु के दर्शन करना।
इसके पश्चात लोग नये या फिर साफ-सुधरे वस्त्र पहनकर मंदिर जाते है और देवताओं का दर्शन करते है। इसके साथ ही इस दिन का सबसे प्रतिक्षित समय विषु भोजन का होता है। जिसमें 26 प्रकार के विभिन्न शाकाहारी भोजनों को परोसा जाता है।
इसी तरह इस दिन देवताओं को भी विशेष प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है जिसमें एक विशेष बर्तन जिसे ‘उराली’ के नाम से जाना जाता है। इसमें खीरा, कद्दू, नारियल, कच्चा केला, आम, अनानास, चावल, सुपारी, अनाज आदि जैसी चीजों को देवताओं के समाने रखकर भोग लगाया जाता है।
इसके साथ ही इस दिन झांकी निकालने का भी रिवाज है। इस झांकी को एक दिन पहले ही सजा लिया जाता है और विषु पर्व के दिन काफी धूम-धाम के साथ आस-पास के क्षेत्रों में घुमाया जाता है। इस झांकी का दर्शन सभी लोगों द्वारा किया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस झांकी के दर्शन करने से काफी पुण्य प्राप्त होता है। इसके पश्चात लोग मंदिरों में जाकर भगवान की पूजा करते है। विषु पर्व के दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार यानि भगवान श्रीकृष्ण की पूजा सबसे अधिक की जाती है।
हर पर्व के तरह आज के समय में विषु के पर्व में भी कई सारे परिवर्तन आये है। वैसे तो कुछ चीजों को छोड़कर इसमें अधिकतर परिवर्तन अच्छे ही हुए है। वर्तमान में इस पर्व को पूरे केरल राज्य में काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन अधिकतर घरों में भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इसके साथ ही आज के समय में इस पर्व को अब काफी वृहद स्तर पर मनाया जाता है और इस दिन कई बड़ी-बड़ी झांकियां भी निकाली जाती है।
हालांकि आज के आधुनिक दौर में लोग अपने कार्यों में व्यस्तता के चलते हुए। पहलें के तरह इस पर्व का आनंद नही ले पाते हैं क्योंकि आज के समय में लोग रोजगार या फिर व्यवसाय के लिए अपने घरों-गावों से बाहर रहते है और इस पर्व पर घर नही आ पाते। जिसके कारण अब इस पर्व का पारिवारिक महत्व कम होता जा रहा है। हमें इस बात का अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए कि हम इस पर्व को अपने परिवार और प्रियजनों के साथ मनायें ताकि इस पर्व का सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व को ऐसे ही बना रहे।
केरल राज्य में काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाने वाला यह विषु पर्व वहां के लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इस पर्व का लोगों द्वारा काफी बेसब्री से इंतजार किया जाता है। मलयालम कैलेंडर में इस दिन को काफी शुभ माना जाता है क्योंकि यह मेष महीने का पहला दिन होता है और इस दिन मलयालम नव वर्ष की शुरुआती होती है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार सूर्य इस दिन अपनी राशि बदलकर ‘मेडम’ राशि में प्रवेश करता है, जिसे कारण नववर्ष का आरंभ होता है।
इसके साथ ही इस समय केरल राज्य में नई फसल, जिसमें मुख्य रुप से चावल शामिल होता है की भी बुवाई शुरु की जाती है। जिसके कारण किसानों द्वारा इस त्योहार को काफी सम्मान दिया जाता है और इसे काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इसके साथ ही पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सूर्य का प्रकाश सीधा भगवान विष्णु के ऊपर पड़ता है। अपने इन्हीं सांस्कृतिक तथा पौराणिक कारणों से इस दिन को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
केरल में मनाये जाने वाले विषु नामक इस अनोखे त्याहार का इतिहास काफी पुराना है। यह पर्व भी वैसाखी, गुड़ी पाड़वा तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तरह नये वर्ष के शुभारंभ तथा फसलों से जुड़ा हुआ है और एकदूसरे से कुछ ही दिनों के अंतर पर मनाया जाता है।
पहले के ही तरह आज के समय में भी इस पर्व को केरल के किसानों द्वारा नयी धान की बुवाई के खुशी में काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। हालांकि इस पर्व की शुरुआत कैसे हुई इस विषय में कुछ विशेष ज्ञात नही है लेकिन इस पर्व से जुड़ी कई प्रकार की ऐतिहासिक तथा पौराणिक कथाएं प्रचलित है।
इसी तरह की एक कथा अनुसार इस दिन सूर्य अपनी राशि में परिवर्तन करता है। जिसके कारण सूर्य का सीधा प्रकाश भगवान विष्णु पर पड़ता है। अपने इसी खगोलीय तथा पौराणिक कारण के वजह से केरल राज्य के लोगों द्वारा इस दिन को मलयालम नववर्ष के रुप में भी मनाया जाता है।
नरकासुर के वध की कथा
इसके साथ ही लोगों का मानना है कि इसी दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नरकासुर का भी वध किया था। यहीं कारण है की इस दिन विष्णु भगवान की पूजा के साथ ही इस दिन उनके कृष्ण की अवतार की पूजा सबसे अधिक की जाती है। इस कथा के अनुसार, प्रगज्योतिषपुर नगर में नरकासुर नामक दैत्य राज्य करता था। अपने तपस्या के बल पर उसने ब्रम्हाजी से यह वर मांगा कि कोई भी देवता, असुर या राक्षस उसका वध ना कर सके।
अपने इस वरदान के कारण वह स्वयं को अजेय समझने लगा। अपने शक्ति के अहंकार में चूर होकर वह सभी लोकों का स्वामी बनने का स्वप्न देखने लगा और अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि जैसे देवताओं को परास्त कर दिया। शक्ति के घमंड में उसने कई सारे संतो और 16 हजार स्त्रियों को भी बंदी बना लिया।
उसके इस उत्याचार से परेशान होकर सभी देवतागण और ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी विनती को स्वीकार करते हुए नरकासुर पर आक्रमण कर दिया और अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर के दो टुकड़े करके उसका वध कर दिया। इस प्रकार से उन्होंने अत्याचारी तथा आततायी नरकासुर का अंत करके लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।
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