Wednesday, July 1, 1970
☞ ब्रह्मोत्सवम
July 01, 1970
भारत मे त्योहार एवं मेलें
ब्रह्मोत्सवम का पर्व तिरुमाला तिरुपति मंदिर में मनाये जाने वाले प्रमुख वार्षिक त्योहारों में से एक है। नौ दिनों तक मनाये जाने वाला यह पर्व भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित होता है। इस त्योहार का काफी भव्य रुप से आयोजन किया जाता है, इस पर्व के दौरान पूरे देश भर से भक्तगण भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए आते हैं।
ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति भगवान वेंकटेश्वर के स्नान अनुष्ठान का साक्षी बनता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यहीं कारण है कि इस पर्व पर देश के वैष्णव श्रद्धालुओं के साथ-साथ भारी संख्या विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं।
वर्ष 2019 में ब्रह्मोत्सवम का पर्व 30 सितंबर, सोमवार से शुरु होकर 8 अक्टूबर, मंगलवार तक मनाया जायेगा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ब्रम्हा भगवान के पवित्र पुश्करणी नदी के जंबले क्षेत्र में मानव जाति के उद्धार के लिए भगवान बालाजी को धन्यवाद दिया था और उनके रुप भगवान वेंकटेश्वर तथा साथियों श्रीदेवी और भुदेवी के साथ भव्य रुप से पूजा थी। इस उत्सव के नाम की उत्पत्ति भगवान ब्रम्हा के नाम से हुई है क्योंकि उनके द्वारा ही सबसे पहले तिरुपति मंदिर में इस पर्व का आयोजन किया गया था।
एक अन्य कथा के अनुसार जब इंद्र ने एक ब्राम्हणी राक्षसी का वध कर दिया था, तो इसके कारण उन्हें ब्रम्ह हत्या का दोष लग गया था। इस पाप के कारण देवेंद्र को स्वर्ग का त्याग करना पड़ा। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने ब्रम्हा जी से प्रार्थना की, उनकी इस समस्या को दूर करने के लिए ब्रम्हा जी ने एक विशेष समारोह का आयोजन किया।
इस अनुष्ठान में ब्रम्हा जी ने भगवान विष्णु को अपने सर पर उठाकर एक विशेष अनुष्ठान किया। यह अनुष्ठान भगवान विष्णु का पवित्र स्नान था, इस स्नान को अवाबृथा के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मोत्सवम का यह पर्व इसी कथा के ऊपर आधारित है।
दक्षिण भारत में इस उत्सव को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान वेंकटेश्वर स्वामी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए 9 दिनों तक चलने वाले ब्रह्मोत्सवम के इस विशेष पर्व में भाग लेते हैं।
पहला दिन
इस पर्व के पहले दिन ध्वजा स्तंभ पर गरुण ध्वज फहराया जाता है। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि गरुण ध्वज देवलोक के ओर जाता है सभी देवताओं को इस पवित्र उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करता है।
इसके साथ ही इस पर्व में विभिन्न देवताओं को विभिन्न प्रकार के वाहनों में बैठाकर मंदिर के चारो ओर घुमाया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘मदविएढुलू’ कहते हैं, इस कार्य के पश्चात शाम के समय में सभी देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है।
दुसरा दिन
ध्वजरोहण और मदविएढुलू के अनुष्ठान के पश्चात दूसरे दिन ‘चिन्ना शेषा वाहनम’ नामक जूलूस निकाला जाता है। यह पर्व नागों के देवता वासुकी को समर्पित होता है। इस अनुष्ठान में भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति को पांच फनों वाले वासुकी नाग की प्रतिमा के नीचे बैठाकर जूसूल निकाला जाता है।
इसी के साथ दूसरे दिन के शाम में भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा को हंस रुपी वाहन पर बैठाकर जूलूस निकाला जाता है। वास्तव में हंस पवित्रता का प्रतीक है और यह अच्छाई को बुराई से भिन्न करने का कार्य करता है।
तीसरा दिन
पर्व के तीसरे दिन ‘सिम्हा वाहनम’ नामक जूलूस निकाला जाता है, इस प्रतिष्ठान में भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति को शेररुपी वाहन पर बैठाकर जूलूस निकाला जाता है। इसके साथ ही यह भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को प्रदर्शित करता है, इस अवतार में उनका आधा शरीर शेर का था और आधा शरीर मनुष्य का।
इसके साथ ही तीसरे दिन शाम को मुथयला ‘पल्लकी वाहनम’ का अनुष्ठान किया जाता है। जिसमें भगवान वेंकटेश्वर को उनकी पत्नी श्रीदेवी और भूदेवी के साथ मोतियों से सजे एक बिस्तर पर पालकी में में बैठाकर घुमाया जाता है।
चौथा दिन
पर्व के चौथे दिन सुबह में भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा को कल्प वृक्ष के वाहन में बैठाकर जूलूस निकाला जाता है। ऐसा माना कल्पवृक्ष वरदानों की पूर्ति करता है औ क्योंकि भगवान वेंकटेश्वर अपने भक्तों की सभी इच्छाई पूरी करते हैं। इसलिए इस अनुष्ठान को ‘कल्प वृक्ष वाहनम’ के नाम से जाना जाता है।
इसके साथ ही चौथे दिन के शाम में ‘सर्व भूपाला वाहनम’ नामक अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। जिसमें भगवान वेंकटेश्वर को एक ऐसे पालकी में बैठाकर घुमाया जाता है। जिसे सर्व भूपाल वाहनम कहा जाता है, जोकि इस बात को प्रदर्शित करता है कि भगवान वेंकटेश्वर सभी के पालनकर्ता है।
पांचवा दिन
पर्व के पांचवें दिन सुबह में भगवान वेंकेटेश्वर की प्रतिमा को सजाकर एक विशेष अनुष्ठान किया जाता है। जिसे ‘मोहिनी अवस्थरम’ कहा जाता है, यह भगवान विष्णु द्वारा मोहिनी रुप धारण करके देवताओं को अमृत पिलाने की घटना को प्रदर्शित करता है। इसके साथ ही पांचवे दिन भगवान वेंकेटेश्वर अपने वाहन गरुण पर विराजमान होते है और भक्तों द्वारा उन्हें चारों ओर घुमाया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘गरुढ़ वाहनम’ के नाम से जाना जाता है।
छठवां दिन
पर्व के छठवें दिन सुबह में भगवान वेंकेटेश्वर की प्रतिमा को हनुमान जी रुपी वाहन के ऊपर बैठा कर घुमाया जाता है क्योंकि हनुमान जी को भगवान विष्णु के त्रेता अवतार प्रभु श्रीराम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। इस अनुष्ठान को ‘हनुमंत वाहनम’ के नाम से जाना जाता है।
इसके साथ ही छठवें दिन के शाम में भगवान वेंकेटेश्वर की प्रतिमा को सोने से बनी हांथी, जिसे ऐरावतम के नाम से जाना जाता है पर बैठाकर घुमाया जाता है। यह भगवान विष्णु के उस घटना को प्रदर्शित करता है जिसमें उन्होंने अपने भक्त गजेंद्र को मगरमच्छ के चंगुल से छुड़ाया था। इस अनुष्ठान को ‘गज वाहनम’ के नाम से जाना जाता है।
सातवां दिन
सातवें दिन सुबह में भगवान वेंकेटेश्वर की प्रतिमा को सूर्य देव द्वारा चलाये जा रहे रथ रुपी वाहन पर बैठाकर घुमाया जाता है क्योंकि पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य की उत्पत्ति श्रीमन नारायाण की आंखों से हुई थी और इसे साथ ही सूर्य को भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है।
इस अनुष्ठान को ‘सूर्य प्रभा वाहनम’ के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही सातवें दिन शाम को भगवान वेंकेटेश्वर को चंद्रमा रुपी वाहन पर बैठाकर घुमाया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘चंद्र प्रभा वाहनम’ के नाम से जाना जाता है।
आठवां दिन
पर्व के आठवें दिन सुबह में भगवान वेंकेटेश्वर को उनकी पत्नियों के संग रथ में बैठाकर घुमाया जाता है। इसके दौरान भक्तों द्वारा गोविंद नामा स्माराना का जयकारा लगया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘रथोत्सवम’ के नाम से जाना जाता है। इस अनुष्ठान को देखने के लिए तिरुमाला मंदिर में भारी मात्रा में भक्तगण इकठ्ठा होते है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति भगवान वेंकेटेश्वर को रथ पर बैठते देखता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसके साथ ही इस दिन शाम में भगवान वेंकेटेश्वर को अश्व रुपी वाहन पर बैठाकर घुमाया जाता है। यह उनके कलयुग में आने वाले अवतार यानि कल्की अवतार को प्रदर्शित करता है। इस अनुष्ठान को अश्व वाहनम नाम से जाना जाता है।
नौवां दिन
पर्व के नौवें दिन सुबह में भगवान वेंकेटेश्वर के एक विशेष अभिषेक का आयोजन किया जाता है। इसमें भगवान वेंकेटेश्वर का उनकी पत्नी श्रीदेवा और भूदेवी के साथ अभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान को ‘चक्र स्नानम’ के नाम से जाना जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान भारी संख्या में श्रद्धालु इकठ्ठा होते है और पुष्करणी नदी के जल में डुबकी लगाते है।
ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन इस अनुष्ठान का साक्षी बनकर पुष्करणी नदी में डुबकी लगाता है। उसके सारे पाप दूर हो जाते है। इस अनुष्ठान को चक्र स्नानम के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही इस दिन शाम में ‘ध्वजाअवरोहणम’ का अनुष्ठान किया जाता है। जिसमें गरुणध्वज को नीचे उतार लिया जाता है। यह इस बात का संदेश देता है कि ब्रह्मोत्सवम का यह पर्व समाप्त हो गया है।
ब्रह्मोत्सवम के पर्व में पहले के समय के अनुरुप कई सारे परिवर्तन हुए है। अब यह पर्व पहले की अपेक्षा काफी अधिक प्रसिद्ध हो चुका है और आज के समय इस पर्व पर भारी संख्या में श्रद्धालु इकठ्ठा होते है। अब यह पर्व मात्र एक क्षेत्रीय पर्व नही रह गया है बल्कि की आज के समय में इस पर्व पर पूरे भारत सहित विदेशों से भी श्रद्धालु आते है। आज के समय में ब्रह्मोत्सवम का पर्व पहले के अपेक्षा में काफी भव्य हो चुका है।
ब्रह्मोत्सवम का यह पर्व कई मायनों में काफी खास है क्योंकि इस पर्व पर तिरुमाला तिरुपति मंदिर में सामान्य दिनों के अपेक्षा कहीं ज्यादे भीड़ देखने को मिलती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति भगवान वेंकटेश्वर के इस पवित्र स्नान का साक्षी बनता है वह जीवन-मरण के इस चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के साथ ही यह पर्व भक्तों को पौराणिक कथाओं से भी परिचित कराता है और हमें इस बात का संदेश देता है कि यदि कोई व्यक्ति भले ही वह ब्राम्हण या स्वयं देवता ही क्यों ना हो, यदि वह गलत कार्य करता है तो ईश्वर द्वारा उसे भी दंड दिया जाता है। सामान्य परिपेक्ष्य में भी इस पर्व का काफी महत्व है, क्योंकि इस दौरान तिरुपति मंदिर और इसके आस-पास के क्षेत्रों की काफी अच्छे से साफ-सफाई भी की जाती है।
ब्रह्मोत्सवम के पर्व को लेकर कई सारी पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं इस पर्व में काफी महत्व है क्योंकि यह हमें इस पर्व के उत्पत्ति के विषय में कुछ विशेष जानकारियां प्रदान करती है।
ब्रह्मोत्सवम के एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रम्हा स्वयं इस अनुष्ठान को करने के लिए पृथ्वी पर पधारे थे। यहीं कारण है कि इसे ब्रह्मोत्सवम के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है ब्रम्हा का उत्सव क्योंकि ब्रम्हा जी ने स्वयं इस अनुष्ठान को पूरा किया था। इसीलिए ब्रह्मोत्सवम के पर्व पर भगवान वेंकटेश्वर के रथ के आगे-आगे ब्रम्हा जी खाली रथ भी चलता है।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष 966 ईस्वी में पल्लव वंश की महारानी समवाई के आदेश पर तिरुपति मंदिर में पहली बार ब्रह्मोत्सवम का यह पर्व मनाया गया था। पल्लव महारानी समवाई ने जमीन से प्राप्त राजस्व में से अनुदान देकर तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के श्रद्धा में पहली बार इस भव्य पर्व का आयोजन करवाया था।
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