नई दिल्ली.23 दिसंबर 1949 में मस्जिद में मूर्तियां रखने के मामले में रामलला पर मुकदमा दर्ज किया गया था।शनिवार कोसुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो उन्हें ही मालिकाना हक सौंपा गया।विवादित स्थल पर जहां रामलला की जन्मभूमि मानी जाती है, वहां रामलला नाबालिग रूप में थे।
हिंदू परंपरा में भगवान को जीवित व्यक्ति माना गया है, जिनके अधिकार और कर्तव्य होते हैं। भगवान किसी संपत्ति के मालिक भी हो सकते हैं। साथ ही वो किसी पर मुकदमा दर्ज कर सकते हैं या उनके नाम पर मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है। हिंदू कानून में देवताओं की मूर्तियों को वैध व्यक्ति माना गया है।
रामलला को भी नाबालिग और न्यायिक व्यक्ति मानते हुए उनकी तरफ से कोर्ट में मुकदमा विश्व हिंदू परिषद के सीनियर नेता त्रिलोकी नाथ पांडे ने रखा था। 23 दिसंबर 1949 में मस्जिद में मूर्तियां रखने का मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क कर ताला लगा दिया गया। कोर्ट ने तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम को इमारत का रिसीवर नियुक्त किया और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा की जिम्मेदारी दे दी।
इसके बाद 1989 में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज देवकी नंदन अग्रवाल ने भगवान राम के सखा (मित्र) के रूप में पांचवां दावा फैजाबाद की अदालत में दायर किया। देवकी नंदन अग्रवाल ने दावा किया था कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियां मस्जिद के अंदर रखी गई थीं। साथ ही जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं। रामलला ही इस संपत्ति के मालिक भी हैं।
ऐसे में रामलला और कोई नहीं, बल्कि स्वयं भगवान राम के नाबालिग स्वरूप को माना गया है। कोर्ट ने उन्हें ही विवादित जमीन का मालिक मानते हुए मालिकाना हक दिया है।
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