Monday, July 8, 2019

☞   *:बचपन के नाम:- एक गजल:*

ले गई जवानी उसे चुपके से चुरा कर
बचपन में हर हफ्ते जो रविवार हुआ करता था,

मैने उन दिनों उठ कर शीशा नहीं देखा
बस काजल के टीके से तैयार हुआ करता था,

वही दोस्त समझते थे बस मेरा झूठा बहाना
जिनके साथ खेले बिना मैं बिमार हुआ करता था,

जहा पर मिलती थी मेरी चूरन की पुड़िया
मेरे लिए वही दुकान पूरा बाजार हुआ करता था,

इक और है बचपन की दोस्त! मेरी दादी
जिसकी कहानियों में रोज त्योहार हुआ करता था,

आज घर से निकला बच्चा इश्क का मारा हो जाता है
एक अपना दौर था दुश्मनो से प्यार हुआ करता था।
_'प्रिन्शु लोकेश'

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