✔️मुख्य बिंदु
समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत के केंद्रीय बैंक ने अब तक कुल हानि-अवशोषण क्षमता (Total Loss-Absorbing Capacity-TLAC) ज़रूरतों पर प्रतिभूतिकरण रूपरेखा (Securitisation Framework) और नियमों को अब तक प्रकाशित नहीं किया है जबकि वैश्विक स्तर पर ये नियम 1 जनवरी 2018 से लागू हो गए थे।
✔️बेसल III (Basel III)
बेसल III मानक बैंकिंग क्षेत्र से संबंधित एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।
ये मानक बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों की एक श्रंखला प्रस्तुत करते हैं जिसके द्वारा बैंकों के विनियमों को सुधारने, जोखिम प्रबंधन और बैंकों का पर्यवेक्षण किया जाता है।
बेसल III मानक 2008 की मंदी के बाद लाए गए थे।
✔️बेसल 3 मानक तीन स्तंभों पर आधारित हैं:
स्तंभ 1: वित्तीय और आर्थिक अस्थिरता से उत्पन्न होने वाले उतार-चढ़ाव को अवशोषित करने की बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता में सुधार।
स्तंभ 2: बैंकिंग क्षेत्र की जोखिम प्रबंधन क्षमता और शासन में सुधार।
स्तंभ 3: बैंकों की पारदर्शिता और प्रकटीकरण को मज़बूत करना।
भारतीय रिज़र्व बैंक TLAC ज़रूरतों को पूरा करने के समय से भी चूक गया है। TLAC आवश्यकताएँ सुनिश्चित करती हैं की बैंकों के पास पर्याप्त रूप से हानि को अवशोषित करने तथा पुन:पूँजीकरण की पर्याप्त क्षमता (loss absorbing and recapitalisation capacity) हो ताकि कठिन समय में भी बैंकों के आवश्यक कार्य बेहतर तरीके से संचालित होते रहें।
TLAC जोखिम-भारित परिसंपत्तियों (Risk-Weighted Assets) का 16% से 20% हिस्सा होता है। जोखिम-भारित संपत्ति का उपयोग पूंजी की न्यूनतम राशि निर्धारित करने के लिये किया जाता है जो कि दिवालिया होने के जोखिम को कम करने के लिये बैंकों और अन्य संस्थानों द्वारा आयोजित की जानी चाहिये। पूंजी की आवश्यकता प्रत्येक प्रकार की बैंक संपत्ति के लिये जोखिम मूल्यांकन पर आधारित होती है। उदाहरण के लिये, एक ऋण जिसे ऋण पत्र द्वारा सुरक्षित किया जाता है, उसे जोखिम भरा माना जाता है।







