
मेरे पड़ोस में एक चौदह साल की बच्ची रहती है।
पहले उसके व्यवहार से मुझे लगता था कि वह बहुत जिद्दी और घमंडी है।
उसके पापा साधारण सी कोई नौकरी करते है, पर उसकी हर इच्छा को जरुर पूरी करते है।
उन दम्पति को शादी के 9 साल के बाद संतान हुई थी। इसलिये बेहद लाड़-प्यार से पली-बढी थी।
एक बार उसने अपने घर में नई चप्पल चाहिये, के लिये बखेरा खड़ा कर दिया।
उसके पापा को आज ही सैलरी मिली थी।
पापा ने काफी खूबसूरत चप्पल लाकर उसे दी।
चप्पल लेकर वो काफी खुश थी। उस दिन उसने चप्पल पहन के खुब उछल-कुद की।
पर अगले दिन आश्चर्य चकित रह गया मैं, जब वो अपनी माँ से कह रही थी कि ये नई चप्पल मैँ नहीं पहनुंगी, मुझे अच्छी नहीं लग रही है।
पुरानी वाली ही ज्यादा अच्छी है।
मुझे सुनकर थोड़ा गुस्सा आया मुझे, और हैरानी भी हुयी उसके पल-पल बदलते व्यव्हार को देखकर।
मन ही मन सोच रहा था, बच्चो को ज्यादा भी लाड़ करना उन्हे बिगाड़ देता है।
फिर शाम को वो मुझे दिखी, मैने उससे पूछा, क्यूँ रे गुडिया जब तुझे चप्पले नहीं पहननी थी, तो इतनी महँगी चप्पले क्यों खरीदवाई ....
और ऊपर से उसको एक दिन पूरा पहन के क्यों घूमी ??
अब तो वापस भी नही हो सकती वो चप्पल...!!!
मेरी बात सुनकर वो हँसने लगी...
और बोली कि, भैया ये सब मैं मम्मी के लिये करती हूँ ..
मेरी मम्मी की चप्पल घिस गई थी, पापा की तनखा ज्यादा नही है, पर मेरे लिये वो सब कुछ ला देते है। मम्मी समझती है पापा की स्थिति इसलिये नई चप्पल अपने लिये खरीदवा नहीं रही थी।
वो भी तो सारा प्यार मुझ पे ही लुटा देना चाहती है।
बस मैने बहाने से चप्पल खरीदवा के पहन ली और इसलिये घूमी की दुकान वाले भैया को वापस ना की जा सके।
अब मम्मी उस चप्पल को पहन के कहीं भी आ जा सकेंगी।
इतनी कम उम्र मे माँ के लिये इतनी प्यारी सोच देख के मैं बहुत खुश हुआ, और उस दिन से उसके प्रति मेरा नजरिया जो जिद्धी और अति शरारती लड़की का था वो बदल गया।
इसलिये कहते है, बेटी कभी भी, कहीं भी हो उसकी जान अपनी माँ मे बसती है।
सच में माँ-बेटी का रिश्ता अनमोल होता है.









