तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझें
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| Supreme Court Of India |
- तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक मामले में 22 अगस्त 2017 को अपना एतिहासिक फैसला सुना दिया है। तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों में से तीन जजों ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है और सरकार को अब 6 महीनों के अंदर तीन तलाक को लेकर कानून बनाना पड़ेगा। कोर्ट के इस आदेश से मुस्लिम महिलाओं को बड़ी राहत मिली है।
- शायरा बानो एवं अन्य की सुप्रीम कोर्ट में याचिका : मार्च, 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी। बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है। कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है।
- शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि वह तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की बात को नहीं मानती हैं। शायरा की याचिका में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की धारा 2 की वैध्यता पर भी सवाल उठाए गए हैं। यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और ‘निकाह-हलाला’ जैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है। इनके साथ ही शायरा ने ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह जैसी कुरीतियों से संरक्षित करने में सार्थक नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई शायरा बानो, आफरीं रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां और अतिया साबरी की अपील के बाद शुरू हुई थी। सभी की ओर से तीन तलाक के अलावा निकाह हलाला और बहुविवाह के मुद्दे पर याचिका दायर की गई थी। लेकिन कोर्ट ने कहा था कि हम सिर्फ तीन तलाक पर फैसला सुनाएंगे।
- कोर्ट ने कहा की अब दुनिया के कई इस्लामिक देशों की तरह भारत ने भी इसे खत्म कर दिया है। देश में कई ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं जिनकी जिंदगी तीन तलाक ने बर्बाद कर दी थी।
- कोर्ट ने कहा की आज के बाद अगर कोई मुस्लिम पुरूष अपनी पत्नी को तीन तलाक देगा तो उसे अवैध माना जाएगा। सरकार को अब 6 महीनों के अंदर तीन तलाक को लेकर कानून बनाना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि अगर छह महीने में कानून नहीं बनाया जाता है तो तीन तलाक पर शीर्ष अदालत का आदेश जारी रहेगा।
- सुप्रीम कोर्ट के जज एवं उनका निर्णय: कोर्ट में 3 जज इसे अंसवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे, वहीं 2 जज इसके पक्ष में नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चिएन), जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यूयू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल थे। इनमें से जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना जबकि चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने इसके पक्ष में थे।
- केंद्र सरकार का रुख: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे में साफ किया था कि वह तीन तलाक की प्रथा को वैध नहीं मानती और इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं है। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने तीन तलाक को ‘दुखदायी’ प्रथा करार देते हुए न्यायालय से अनुरोध किया था कि वह इस मामले में ‘मौलिक अधिकारों के अभिभावक के रूप में कदम उठाए.’।








